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सोवियत संघ के विघटन से रूस को महाशक्ति बनाने मे सारथी पुतिन का योगदान

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सोवियत संघ के विघटन से रूस को महाशक्ति बनाने मे सारथी पुतिन का योगदान

सोवियत संघ के विघटन के साथ ही उन्होंने राष्ट्रपति पद की शक्तियां रूस के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन को सौंप दी. उस रात क्रेमलिन पर फहरा रहे हथौड़े और हंसिए वाले सोवियत झंडे को उतार दिया गया और क्रेमलिन पर रूसी तिरंगा लहराने लगा.

 

 

अगले दिन सुप्रीम सोवियत ने सोवियत गणराज्यों की स्वाधीनता स्वीकार करते हुए यूएसएसआर का औपचारिक रूप से विघटन कर दिया.

दुनिया भर में एक ख़ास प्रभाव रखने वाले सोवियत संघ ने सत्तर साल तक अलग-अलग तरह के तमाम राज्यों को नियंत्रित किया था और एक इतने विशाल साम्राज्य का इस तरह अचानक विघटित हो जाना, एक दुनिया बदलने वाली घटना थी.

 

पहचान का संकट

एल्कानो रॉयल इंस्टीट्यूट में रूस एवं यूरेशिया मामलों की जानकार मीरा मिलसेविक बताती हैं, "रूस पश्चिम की तरह कभी भी एक राष्ट्र - राज्य नहीं रहा. रूस एक साम्राज्य रहा है, लेकिन ये कभी भी एक राष्ट्र-राज्य नहीं रहा.

ऐसे में सोवियत संघ के विघटन के साथ ही रूस ने अपने लिए रूसी राष्ट्रीय पहचान बनाने की कोशिशें शुरू की. लेकिन ये एक काफ़ी जटिल प्रक्रिया थी क्योंकि रूस कई जातियों और राष्ट्रीयताओं वाला देश है, वहां महान परंपराएं हैं जो कि उसके साम्राज्यवादी इतिहास से जुड़ी हुई हैं."

1990 के दशक में रूस ने अपनी राष्ट्रीय पहचान के साथ पश्चिमी दुनिया के साथ अपने रिश्तों को भी परिभाषित करना शुरू किया.

लेकिन अमेरिका और पश्चिमी देशों ने सोवियत संघ के पतन और शीत युद्ध ख़त्म होने के बाद वाले दौर में रूस को सोवियत संघ जैसी महाशक्ति के रूप में देखना बंद कर दिया.

रूस की अंतरराष्ट्रीय हैसियत में गिरावट मॉस्को का प्रभाव क्षेत्र माने जाने वाले पूर्वी यूरोप में नेटो के विस्तार के रूप में सामने आई.

पुतिन का आगमन

रूस से जुड़े मामलों पर नज़र रखने वाले पर्यवेक्षक मानते हैं कि जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सोवियत संघ के विघटन को "20वीं सदी में दुनिया की राजनीति की सबसे भयावह त्रासदी बताया था", तब वह इसी ओर इशारा कर रहे थे.

पुतिन ने कहा था, "यह सोवियत संघ के नाम पर ऐतिहासिक रूस का विघटन था. हम एक अलग ही देश बन गए. हमने 1000 सालों में जो कुछ बनाया था, उसका ज़्यादातर हिस्सा खो गया."

इसी वजह से साल 2000 में सत्ता में आने के बाद से पुतिन ये स्पष्ट कर चुके हैं कि वह सालों तक अमेरिका और उसके नेटो सहयोगियों द्वारा कथित अपमान के बाद रूस को एक बार विश्व शक्ति बनाने के प्रति दृढ़ संकल्प हैं.

मीरा मिलसेविक मानती हैं कि पुतिन रूस को एक बार फिर एक विश्व शक्ति के रूप में रणनीतिक भूमिका देने में सफल हुए हैं.

वह कहती हैं, "पुतिन अपने आपको रूस के मसीहा के रूप में देखते हैं क्योंकि साल 1990 में लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया असफल होने के बाद रूस पतन और दिवालियेपन के दौर से गुज़र रहा था. पुतिन ने रूस को बचाकर अंतरराष्ट्रीय पटल पर एक रणनीतिक किरदार की भूमिका में वापस ला दिया है."

ये बात सही भी है कि पुतिन ने नब्बे के दशक के बाद अपने देश को उस जगह पहुंचाया जहां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसे सुना जाता है. नब्बे के दशक को रूस में खोए हुए दशक के रूप में माना जाता है.

 

केजीबी जासूस से राष्ट्रपति तक

पुतिन ने सोवियत संघ की ख़ुफिया एजेंसी केजीबी में 16 सालों तक जासूस के रूप में काम करने के बाद साल 1991 में राजनीति की पारी शुरू करने के लिए अपने पद से इस्तीफ़ा दिया था.

इसके बाद साल 1999 में पुतिन को अंतरिम राष्ट्रपति चुना गया और मात्र चार महीने बाद हुए चुनाव में पुतिन एक पूर्णकालिक राष्ट्रपति चुने गए.

यही नहीं, इसके बाद पुतिन साल 1953 में दिवंगत हुए सोवियत नेता जोसेफ़ स्टालिन के बाद सबसे लंबे कार्यकाल वाले राष्ट्रपति बने.

इस साल अप्रैल में संवैधानिक सुधारों को लेकर हुए एक विवादित राष्ट्रीय मतदान में उन्हें 2024 में ख़त्म होने वाले अपने चौथे कार्यकाल के बाद भी सत्ता पर बने रहने का मौका मिल गया है.

 

 

व्लादिमीर पुतिन रूसी ख़ुफ़िया एजेंसी केजीबी में काम कर चुके हैं ऐसे में 69 वर्षीय पुतिन साल 2036 तक सत्ता में बने रह सकते हैं.

उनकी आलोचना करने वाले दावा करते हैं कि राष्ट्रपति पुतिन ने सोवियत संघ के दौर में जिस तरह ख़ुद को ढाला था, उसने ही दुनिया को लेकर उनका नज़रिया गढ़ा है.

लंदन स्थित किंग्स कॉलेज़ में वॉर स्टडीज़ विभाग की प्रोफ़ेसर नताशा कुहर्ट कहती हैं, "ये स्पष्ट है कि रूस अंतरराष्ट्रीय चर्चा में आ गया है लेकिन ये सकारात्मक कारणों की वजह से नहीं हुआ है."

वह कहती हैं, "ये देखना काफ़ी दिलचस्प है कि दस साल पहले तक वे ये कहते थे कि रूस को अपने आपको आकर्षित बनाना है. उसे सॉफ़्ट पॉवर इस्तेमाल करने की ज़रूरत है.

अब वह बदल गए हैं. अब मॉस्को में कोई ये नहीं कहता कि वे अपने आपको आकर्षित बनाना चाहते हैं. वे रूस को वैश्विक पटल पर एक किरदार के रूप में देखना चाहते हैं. वे चाहते हैं कि रूस को दुनिया स्वीकार करे और उसे भी सुना जाए. अगर आप सिर्फ रणनीतिक जोड़-तोड़ के नज़रिए से सोचें तो अगर पुतिन ने जो चाहा उसे हासिल कर लिया है."

 


रूस की वैश्विक शक्ति

यह दुनिया का सबसे बड़ा देश है जिसका क्षेत्रफल 1.7 करोड़ वर्ग किलोमीटर है.

यह अमेरिका के बाद प्रतिदिन 10.27 बैरल तेल उत्पादित करने वाला दुनिया का दूसरा बड़ा तेल उत्पादक देश है.

रूस के पास अमेरिका के बाद सबसे ज़्यादा परमाणु वॉर हेड हैं जिनकी संख्या 6,375 है.

रूस रक्षा क्षेत्र में सबसे ज़्यादा खर्च करने वाले देशों की सूची में चौथे स्थान पर है. साल 2020 में उसने अपने रक्षा क्षेत्र में 66,840 मिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च किया है.

रूस यूएन सिक्योरिटी काउंसिल में स्थायी सदस्य है जिसके पास वीटो पावर है.

 

क्या हैं पुतिन की प्राथमिकताएं

विशेषज्ञ बताते हैं कि सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस की हैसियत में आई गिरावट को थामने और पुरानी हैसियत दोबारा हासिल करने की दिशा में पुतिन की सबसे बड़ी प्राथमिकता ये थी कि वह उन क्षेत्रों में विदेशी ताक़तों के प्रभाव को बढ़ने से रोकें जो कभी सोवियत संघ के नियंत्रण में रहे हैं.

साल 2008 में रूसी सेना ने जॉर्जिया पर आक्रमण किया था ताकि पश्चिमी देशों के समर्थक जॉर्जियाई राष्ट्रपति मिखाइल साकाशविली को रूसी संरक्षण वाले दक्षिण ओसेटिया के अलगाववादी जॉर्जियाई क्षेत्र पर फिर से सैन्य क़ब्ज़ा करने से रोका जा सके.

अगर साकाशविली अपने विभाजित मुल्क को एकजुट करने में सफल हो पाते तो वह जॉर्जिया को नेटो में शामिल होने लायक देश बनाने के अपने लक्ष्य के क़रीब पहुंच सकते थे.

इसी तरह साल 2014 में पश्चिमी देशों के समर्थन वाले आंदोलन के बाद मॉस्को समर्थक यूक्रेनी राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच को पद से हटा दिया गया.

इसके बाद रूस ने यूक्रेन में सैन्य हस्तक्षेप करके पहले क्रीमियाई प्रायद्वीप पर क़ब्ज़ा किया. इसके बाद पूर्वी यूरोप में रूसी भाषा वाले क्षेत्र में यूक्रेन विरोधी विद्रोहियों का समर्थन किया.

मीरा बताती हैं कि ये हमले पुतिन द्वारा सोवियत संघ को दोबारा स्थापित करने की ओर क़दम नहीं थे बल्कि यह रूस की राष्ट्रीय रक्षा से जुड़े ऐतिहासिक सिद्धांत का मसला था.

वह बताती हैं, "अपने प्रभाव के क्षेत्रों की रक्षा करने के प्रयास, रूस की राष्ट्रीय सुरक्षा वाले विचार से जुड़े हैं जिसके तहत इन क़दमों को राष्ट्रीय हितों की रक्षा के रूप में देखा जाता है. और यह विचार रूस पर हुए हमलों के ऐतिहासिक अनुभवों पर आधारित है.

रूस इस समय ये चाहता है कि उसके और उसके संभावित दुश्मनों के बीच दूरी रहे और रूस नेटो को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा मानता है. वह नेटो को अपनी सीमा पर नहीं चाहता है."

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